वसुधा
जननी... जननी...
हे ! जन्म प्रदायिनी... !!
जन -कुल मंगल दायिनी !
वन-प्रसूत धन- धारिणी...
रागिनी...
स्वच्छ मारुत श्वासिनी
लहरित-सिंधु जनित जलध मोहिनी...
हिम-चुम्बित शिखरिणी
मोहक चंचल प्रकृति प्रदर्शिनि
धवरित चलित हिंरण
विहंग विभा-शालिनी ,
रवि-रजत सहित गगन शोभिनी
धन्य, धन्य.. हे
जननी.. अन्नपूर्णी... !
युद्ध
भूखी धरती...
चकोर जैसे..
आहें भरती। ..
"लू" से लड़ते...
जन -जानवर
आशा के साथ...
ऊपर देखते। .
एक दो भूंदे
अमृत जैसी..
किस देवता की कृपा से?
वैज्ञानिक ..
हवाई
जहाजो को घोड़े बनाते
बादलों
को खींच लाते ………
और फिर आंधी..
बिछड़े बाढ़ल..
असहाय उड़ाने...
फिर
बादलों को खोजते
अम्बर में ……….
अम्बर और धरती के बीच
फिर एक घोर युद्ध। .
निरंतर …..
और जन -जानवर..
आहें भरते
चकोर जैसे.. !!
ताज !!
खिड़की के उस खोने पर..
दो कबूतर......
दो कण भोग में...
दो कण योग में... !!
मुहब्बत के
जंजीरो को तोड़ते हुए...
कण बीते..
कण बीते..
दोनो अपने अपने रास्ते में...
वियोग रस छोड़कर. ...
कभी.. कभी...
मैं भी चाहता हूँ
उन कबूतरों के जैसे...
खिड़की के उस खोने पे..
दो कण भोग में..
दो कण योग में...
पर......
काश !
काश !
खिड़की के उस पार
जमुना के तीर............
मेरा ताज बन चुका है !
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