Tuesday, August 9, 2016

माया ......प्रथम सर्ग

माया
प्रथम सर्ग

अम्बर में आनंद ही है आनंद
आज फिर गयी है उषा ...........
अपनी सुनहली सहेलियों के साथ
आलिंगन करने इस धरती को !

तरुवर में है कलरव, हलचल
अँगड़ाइयाँ लेते आलसी विहंग
भंवर गाते, पल्लव नाचते
भागीदारी है जीवन हर प्रहर !

रिमझिम सरिता बहती, बहती
रीत, युगों की कहानियाँ कहती
नहाते, सब दिल बहलाते
रचकर नाटक, किनारे बैठे गजानन !

रही यही कहानी
फिर वही रोशनी
तिमिर से दिन की ओर
चक्रव्यूह से निकल पाते
सूरज-चाँद !

हर सुबह..
किसी खोज में उठता मानव
किस खोज में?

किसी खोज में... !!

यश की...
धन की...
प्रेम की..
और किसी की?

अर्थ समेटता
यश भरता...
लालच में...
और भी ग्रहण करता.. और भी...
खोजता... समेटता। .
 नाखुश। ...
 टूटा-सा
खोया- सा। ..
जिंदगी भर ढूंढता। .
सिर्फ यह समझता..
मंजिल अपना क्या है ?
मंजिल अपना कहाँ है ?

दिन भर .
अपनी ही छाया के पीछे
भागता.. दौड़ता..
पसीने में नहाकर
संध्या के द्धार पर
सिकुड़कर बैठता ........
सितारों को गिनता....
सुबह तक।
एक नयी आशा के साथ
एक नयी खोज में...
एक नयी दिशा के लिए..
जीवन भर इंतजार में...... !!

"सत्य क्या है जीवन का...
भोग या त्याग ?
जन्म या मरण ?"
मिथ्यायुक्त मानव को
मिलेगा कब ज्ञान?

अग्निशिला आगे बढाकर
आत्म-ज्ञान का दीप जलाकर
बैठे शीष गुरु के द्धार
अंतरिक्ष देख रहा था जीवन तयोहार !

अम्बर में सितारो की आंखमिचौनी
आशाओं की दिल में आंखमिचौनी
अंधे तिमिर की आत्मा चीर कर
रहा थी ओम की ध्वनि !

संध्यादीप हाथ लिटाकर
सामगान का  ताल बजाकर
चरण धरती का रोज धुलाकर
चंचल गंगा चल रही थी !

"धन्य धन्य है सखी गंगे "
धरती माँ किनारे बैटी !
"देखा, सुना क्या तुमने ?
ये यंत्र वेद मंत्र ?"

मुस्कुरायी देवी गंगा ने
माँ धरती की बात समझकर !
"युग, युग से रहे यही प्रश्न ,
रहे चंचल ही मेरे पुत्र.!
साँझ सबेरे कोशिश करके भी
समझ पाये सत्य तत्व !"

मुस्कुराती....
मोहक चाल के साथ
गंगा बह रही थी !

बैठी थी..
धरती माँ भी
वहीँ किनारे। .
देखती..
समझती.....
संभालती...
समय की बहती धार !

हुआ अचानक यह क्या?
क्यों कांपता है पवन ?
गरजते घने बादल ?
शीतल किरणें  बने अनिल ?
मुरझाते क्यों फूल ?
भयभीत दौड़ते पशु.....
घोसलों से चीख़ते विहंग?

अंड पिण्ड टूटते है क्या?
आग हाथ लिए
गए क्या भोले नाथ ?
अमर-दानवों का युद्ध
रहा है क्या फिर एक बार ?

क्षितिज का तन कांप रहा है
सितारों से आग के ओले
आँगन भर रहें हैं !

कौन है वह बाला ?
नन्ही-सी
नयनों में शंका भरकर
आगे कदम बढ़ाती...

धीरे.. धीरे..
धरती की ओर। 

"माँ। .:
चौक उठी भू-माता  !
"प्यारी..  प्यारी..
नादान लगती..
कहाँ से ऐसी सुन्दर?
देखि माँ ने उसकी रेखा...
देवलोक की एक नयी भाषा..
कौन बताएंगे....
इस सौंदर्य की परिभाषा..
कितनी सुन्दर है यह बाला
देखी नहीं कभी ऐसी शोभा। .
धरती माँ का दिल हुआ खुश..
ममता से भरा दिल...

पर,  फिर यह क्या हाहाकार ?
लहरें उठी गगन चूमने..
पवन के दिल में भरा क्यों अग्नि ?
फूल असमय मुरझाते..
भयभीत कोयल रोता क्यों ?..
और...
गंगा भी..
बिना बताये
कहाँ जा रही है..
अपनी रास्ता भूलकर ?

हंस उठी अपनी दिल में..
 वह बाला
" गयी हूँ......
मैं
माया... "

अग्निशिला में आग
जल रही थी..
अम्बर में अशांति..
बह  रही थी !
आत्मबोध में लगे शिष्य
आचार्य के साथ बैठे..
अम्बर को ........
चीरते आवाज ..
गूँज उठा "ओम "!


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