Thursday, August 18, 2016

माया सर्ग -2

माया

सर्ग -2

"धन्य हो, हे मातृश्री  ! "
आकर बैठे किनारे पर
अग्नि-देव आशंका सहित !

बह रही थी पावन गंगा,
भक्तों का पाप धुलाकर
बरसों की याद मिटाकर !

कही गंगा ने :
"अग्निदेव,
आज मैं दुर्बल लगती हूँ
मेरी धारा में.
दुख के धुन
सुन रहें है !
खोयी-खोयी सी....
मन चंचल है... !”

अग्निदेव देख रहे थे
अम्बर की और !

आ रही थी
बाला
अमंगल सुरे जाती
असत्य की दर्शन दिखाती !

"माते !
अनुमान सही है आपकी
अम्बर से...
आ रही है
असत्य की आशा
अंड-पिंड जीतने!”

गंगा फिर कहने लगी :
"सही कहा आपने.. अग्निदेव
पता नहीं क्या हो रहा है..

भविष्य की अंधकार....
बाँहों में लेकर

निशा की अधूरी नींद
आंखो में लेकर

आहों में ईर्ष्या की
धुन भरकर..
रही है क्या?

बाला,
रही है कहाँ से ?

भगवन!
किसकी सृष्टि है यह?
कभी किया है गलती
ब्रह्मदेव ने भूल से भी ?

"कब बनाये थे विधाता ने
ऐसी एक आकार
जो..
इस समस्त सृष्टि को बना दे
निराधार !

वरुण भी आये
विचलित....
"कलियुग की
यह पहली कलि है क्या?
विनाश की है क्या
यह नयी वेष -भूषा ?"

"देखा क्या यह सब माते ?"
अग्निदेव ने पूछा
बेचैन गंगा से !
"अशुभ लगते है यह सब.
 लगता है....
सदियों का पाप
मिलकर 
आज धरती पर
उतर रहा है !"

"प्यारी सखी,
मुग्ध हो गयी क्या
तुम इस बालिका से ?"

गंगा ने पूछा
भू माता से ! 

"माँ हूँ ?"
ममता मेरी पुकार रही है..
मानस को प्यार से
भर रही है...
अच्छे हो या बुरे,,
बच्चे होतें हैं बच्चे !"

"अति सुंदर"
बाला को
देखकर बोली
पृथिवी माता
“देखा नहीं कभी
ऐसी सुन्दर ,,
अतिसुन्दर बाला। ."

उतर आ रही थी
वह बाला
पग-पग में
भय की बीज बोती !

आँखे  विषैली ….
अधरे विषैली ……..

अंग-अंग में ..
तमस की छाया……..
अगणित.........
युगों का अन्धकार
अपने दिल में भरकर !

फिर बोली धरती माता
“देखा नहीं कभी
ऐसा सौंदर्य !
नज़र लुटा रही है
दिल लुभा रही है “

उतर रही थी
वह बाला..
मुस्काते फूल
आज क्यों मुरजाते ?

गगन काँप रहा था..
घने बादल मौन हुए
गर्जन अपने ही दिल में समेटकर !. 

पवन दिशा रहित
पथ –भ्रष्ट !
विहंगों का हाहाकार
कैसी विडम्बना प्रकृति की ?

पवनदेव बोल उठे
"सोचता हूँ..
इसे फ़ेंक दूँ
अम्बर से बाहर,,,
अपनी पूरी शक्ति लगाकर !"

अग्निदेव असहमत थे
" इतनी  दूर?........
मैं तो भस्म कर दूंगा
एक हे क्षण में !"

"सागर में डुबा दूं?"
वरुणदेव पीछे न रहे !

"शांत, सब रहें शांत !
कुछ न करेंगे आप

बाला वह मेरी है...
पृथ्वी माता हूँ मैं
भार संभाल रहीं हूँ
सबका..
अच्छे.. बुरे..
शोबित
वंछित
माँ हूँ..
सब हैं मेरे बच्चे..
और यह बालिका भी
मेरी
इस धरती की !

अम्बर से माया
देख रहीं थी
विशवास के साथ
"हाँ, कल यह धरती
मेरी बनेगी..
और मेरी हे रहेगी....
मैं हूँ माया !'


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